बात उस समय की है जब भारत में ब्रिटिश हुकूमत ‘God save the king’ बजा रही थी. ऐसे में, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस (Subhash Chandra Bose) अंग्रेज़ों को अपने प्रिय राष्ट्रगान, ‘सब सुख चैन’ यानि ‘जन गण मन’ (Jan Gan Man) से आंखें दिखा रहे थे.
नेता जी के उस तेवर को सलाम, जिस तेवर ने ना सिर्फ अंग्रेज़ों को मात देने के लिए एक समानांतर फौज खड़ी की थी बल्कि उन्होंने तो एक पूरी समानांतर सरकार और यहां तक कि एक उसका समानांतर राष्ट्रगान भी घोषित कर दिया था. ये राष्ट्रगान था, नेता जी का प्रिय, और आज हम सब का अपना… जन गण मन!!
जनगणमनकीकहानी…
आज चरखा पर बात करेंगे उस गीत की जिसे लिखा और संगीतबद्ध किया, गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर ने. पर जिस गीत को भारत के आज़ाद मुस्तकबिल का तराना बनाया, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने.
इतिहास
गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर, ब्रह्मो समाज के अनुयाई थे. टैगोर ने 1911 में एक, पांच स्टेंज़ा का ब्रह्मो गीत/भजन लिखा था, भारतोभाग्योबिधाता.
उसी साल, यानि 1911 में ये गीत, पहली बार लोगों के बीच 27 दिसंबर के रोज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया. लोगों के बीच इस गीत को सरलादेवीचौधरानी ने गाया था. ये वही सरला देवी चौधरानी थीं जो अक्सर कांग्रेस के अधिवेशनों में वन्देमातरम भी गाया करती थीं. ब्रह्मो समाज की अपनी पत्रिका ‘तत्वबोधिनी’, जिसके संपादक स्वयं टैगोर थे, में यह गीत 1912 में छपा. और फिर बहुत समय तक इस गीत का प्रचार प्रसार सिर्फ ब्रह्मो समाज के अनुयायियों तक ही सीमित रहा.
कलकत्ता के बाहर ये गीत पहली बार 1919 में सुनाई दिया जब स्वयं गुरुदेव ने इसे आंध्रा प्रदेश के Annie Besant Theosophical society के एक अधिवेशन में, लोगों की फरमाइश पर गाया. और फिर वहीं, जब उनसे आग्रह किया गया तो गुरुदेव ने इस गीत का अंग्रेज़ी में अनुवाद भी कर दिया. अंग्रेज़ी में ये गीत अब ‘Morning Song of India’ कहलाया.
इस तरह भारत के मंगल भविष्य की प्रभु से कामना करने वाला ये गीत, धीरे धीरे आज़ादी चाहने वालों में लोकप्रिय होता गया. इसका दर्जा, आज़ादी की लड़ाई में प्रेरणा प्रदान करने वाले गीत के रूप में होने लगा.
सबसुखचैनऔर INA
बात 1941 की है. नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की सिंगापुर में स्थापित और घोषित आज़ाद हिन्द गवर्नमेंट की Minister of women’s affairs थीं Capt Laxmi Sehgal. लक्ष्मी सहगल को जन गण मन बहुत पसंद था. उन्होंने इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों में सुन रखा था. एक बार INA की महिला यूनिट की एक सभा में उन्होंने इस गीत को सबसे गवाया. इस सभा में नेता जी भी मौजूद थे. और फिर बंगाल से निकले इस गीत के स्वर सुभाष चन्द्र बोस को इतने प्रिय हुए, इतने प्रिय हुए, कि इस गीत को उन्होंने INA anthem बना लिया (Adopted on 2 November 1941).
बोल
नेताजी को लगता था कि जन गण मन ही वो गीत है जो अपने बोलों के साथ भारत की भाषाई, धार्मिक, प्रांतीय विविधता को एक सूत्र में बांधने का काम करता है. इस गीत के बोल हर भारतवासी को आपस में जोड़ने का काम करते हैं.
भाषा
चूंकि, भारत भाग्य विधाता, यानि जन गण मन, sanskritized बांगला में लिखा गया था. नेता जी ने इसका अनुवाद, आसान हिन्दुस्तानी में करवाया. उन्होंने इसके अनुवाद की ज़िम्मेदारी, आज़ाद हिन्द रेडियो के मुमताज़ हुसैन और INA के Col Abid Hasan Saffrani को दी थी. और इस तरह गुरुदेवकाभारतोभाग्योबिधाता, नेताजीकेसबसुखचैन में बदल गया.
धुन
नेता जी कहते थे राष्ट्र गान ऐसा होना चाहिए, उसका संगीत स्वर ऐसा होना चाहिए, कि मेरी तरह भारी आवाज़ वाले लोग भी उसे आसानी से गा सकें. दूसरी बात ये कि वो मानते थे कि अक्सर विदेशों में औपचारिक समारोह पर सिर्फ़ राष्ट्रगान की धुन ही बजाई जाती है, उसे गाया नहीं जाता, इसलिए शब्दों की बजाय धुन ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है.. इसलिए धुन ऐसी होनी चाहिए जो बजने पर अपनी छाप छोड़े. इस गीत को यूं तो गुरुदेव पहले ही संगीतबद्ध कर चुके थे पर नेता जी, गीत की धुन कुछ ऐसी चाहते थे जो सोए हुए भारतीयों को भी जगा दे. उन्हीं के कहने पर इस गीत की धुन को Capt Ram Singh के band ने एक martial touch दिया था.
पहली बार हैम्बर्ग में बजाई गई
11 सितंबर 1942 के दिन, जर्मनी के शहर हैम्बर्ग में German-Indian Society की स्थापना के अवसर पर, सुभाष चन्द्र बोस की उपस्थिति में, भारत के राष्ट्र गान के तौर पर ये धुन जब पहली बार बजाई गई, वहां मौजूद हर भारतीय और जर्मन को इस धुन ने मोह लिया.

और फिर आया आज़ादी का दिन…
15 अगस्त 1947. आज़ाद भारत में जब पहली बार पंडित जवाहलाल नेहरू ने लाल किले से तिरंगा फैराया, तो उस आजादी के जश्न में INA के Capt राम सिंह और उनके पूरे band को खास तौर पर बुलाया गया. जैसे ही आज़ाद भारत की आज़ाद फिज़ा में Capt राम सिंह और उनके band की बजाई, जन गण मन की धुन फैली, भारतीयों का रोम रोम खिल उठा .
और फिर 24 जनवरी 1950 के दिन वो समय भी आया जब भारत के प्रथम राष्ट्पतिराजेंद्रप्रसाद ने विधिवत्, जनगणमन को, देश का राष्ट्रगान घोषित कर दिया. लेकिन स्वतंत्र भारत का राष्ट्रगान घोषित करने से पहले इसपर तमाम विचार विमर्श, व्यापक बातचीत हुई थी. पूरी प्रक्रिया का पालन हुआ था.
भारत के सभी प्रांतों के राज्यपालों ने अपने अपने प्रीमियरस की सहमति से इस बारे में राय दी. एक प्रांत को छोड़ बाकी सबने, जन गण मन के पक्ष में ही अपनी राय दी थी.
Constituent assembly में भी इसके पक्ष में बोलते हुए नेहरू जी ने वही बातें दोहराईं, जो कभी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के राष्ट्रगान के रूप में अपनाए जाने पर, कही थीं. इस तरह, अपने आसान बोलों और जोशीली धुन के कारण जनगणमन को हर आम और खास की, आज़ाद भारत के राष्ट्रगान के रूप में एक व्यापक स्वीकृति मिली.
विवाद
और अब आते हैं सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पर. वो बात ही क्या जिसमें विवाद ना हो. गुरुदेव ने जब 1911 में इस ब्रहमोगीत की रचना की थी, कुछ लोगों ने ये अफ़वाह फैला दी कि रविन्द्र नाथ टैगोर ने ये गीत जॉर्ज पंचम की ताजपोशी के वक्त उनकी महिमामंडन में लिखा था. बाद में जब रबीन्द्रनाथ टैगोर को सर की उपाधि से नवाजा गया, इस अवधारणा ने और ज़ोर पकड़ा. इस अवधारणा के ज़ोर पकड़ने के पीछे ये भी कारण था कि गुरुदेव ने इस बात का कभी खंडन नहीं किया था.

गुरुदेवकाख़त
10 नवंबर 1937 को टैगोर, पुलिन बिहारी सेन को लिखे अपने एक खत में लिखते हैं, कि इस अफ़वाह का खंडन उन्होंने कभी नहीं किया क्योंकि ऐसा करना उनके लिए एक तौहीन, एक अपमान के बराबर था. वो आगे लिखते हैं, कि उनकी कलम से भारत के भाग्य विधाता के रूप में कोई जॉर्ज पंचम, शष्टम या सप्तम कभी नहीं हो सकता.
इस खत में वो ये भी मानते हैं कि उनके एक अंग्रेज़ मित्र जो कि सरकार में एक उच्च पद पर आसीन थे, उन्होंने ज़रूर जॉर्ज पंचम की ताजपोशी के लिए गुरुदेव से ऐसा गीत लिखने को कहा था, पर इसे गुरुदेव ने तुरंत ही ठुकरा दिया था.
टैगोर हमेशा ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ थे. अगर हम उनका ये पूरा 5 stanza का गाना पढ़ें, तो जान जाएंगे कि ये गीत किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि ये भारत देश के बारे में ही लिखा गया है. इस गीत के आखिरी स्टैन्जा में एक लाइन थी: ‘निद्रितो भारतो जागे’ मतलब ‘सोता भारत जाग गया है’. इसका ज़िक्र, जवाहर लाल नेहरू ने अपनी ‘Freedom at Midnight’ स्पीच में भी किया था.
अवधारणाकीवजह
दरअसल ये अवधारणा एक गलती से उत्पन्न हुई थी. जॉर्ज पंचम की ताजपोशी के वक्त किन्हीं रामभज चौधरी द्वारा “बादशाह हमारा” नाम का गीत समारोह में गाया गया था. अगले दिन विलायत की कुछ अखबारों में इसे गुरुदेव के नाम से जोड़ दिया गया. और एक छोटी सी अख़बारी गलती ने बड़े समय के लिए, एक विवाद को, जन्म दे दिया.
आखिरमें
खैर, सब विवादों से परे, हमारा राष्ट्रगान हमारा गौरव, हमारी ताकत है. ये एक सेक्युलर गीत है जो सही मायने में हमारे देश की पहचान है. महात्मा गांधी कहते थे, ये गीत लोगों के दिलों को छू चुका है. हम कहते हैं इस गीत को हमने दिल में बसा के रखा है. ये गीत सिर्फ़ राष्ट्रगान ही नहीं है, आज़ादी की जंग लडने वाले हमारे बुजुर्गों, का ये आश्रीवाद है. और उनका ये आशीर्वाद हमारे सर का ताज है





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