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कानून तेरी ऐसी की तैसी ….
कह रहिन कक्काजी – मनोज

कानून तेरी ऐसी की तैसी ….
कह रहिन कक्काजी / मनोज

कानून ! कानून ! कानून! क्या कहता है कानून। चलते हाथों से कोई “मोबाइल” छीन ले जाए! हम सिर पीटते रह जाएं। हम “पैसा” निकाल कर निकलें !कोई उसे “लूट” भाग जाए ! हम “मूकदर्शक” बने रह जाएं। कोई दनदनाती “गोली” मेरे सीने, मेरे सिर, शरीर को “बेध” जाए। हम “सरेआम” छटपटाएं। हमारे “प्राण” पखेरू हो जाएं। परिवार को “आश्वासन” की पोटली और “चुप्पी” का मुआवजा मिल जाए । चोरी का क्या है साहेब। जित देखो तित पाएं। घर- दुकान। रात हो या विहान। चोर हाजिर है श्रीमान । डिक्की से पैसा निकालने को। साइकिल से छोला उजक जाने को। दुकान का शटर काट समान चुराने को। जबकि चौकिदार है ! पहरेदार है! थानेदार है! पुलिस की चौकड़ी है! पैसे वाली नौकरी है। अत्याधुनिक गन है। लग्जरी गाडियां। रैपिडेकस एसआइटी ,डाग स्क्वायड फोर्स, सैंतालीस , छप्पन , काररवाइन, इंसास हुए अप्पन । फिर भी अपराध। अपराधी बौराए है। एकाध केस छोड़ दें तो हम! सिर्फ मुँह की खाए हैं। बातें चाहे लाख कर लें बड़ी – बड़ी। सरकार की छिया लेदर ही कराए हैं। सूबे की कौन कहे जिले की ले लेते हैं।”नवरूणा” बनी पहेली है। बैंको की लूट “अलबेली” है। सीएसपी का लूट जाना मानो “सहेली” है। साहेब कैश वैन को लूट जाना, एक बार दो बार नहीं बार बार दोहराना, मानो किसी सिनेमा का सीन बार- बार दिखाना है। ड्रामा भी वही चार गिरफ्तार, दो कट्टा, छह गोली, चार मोबाइल, पैसा मुँहबोली। हो गया उदभेदन। हमारी हँसी, पीड़ित की खुशी, सरकार का डंका, पुलिस का महिमा मंडन । खुद में वंदन ।हमारा अभिनंदन। हकीकत ढाक के तीन पात। माया मिली न राम। यकीन न हो तो लुटे लोगों से पूछिए। गर अपनापन हो तो जात -धर्म, भेद-भाव ,ऊँच – नीच ,संगी – साथी के आधार पर लूटेरो से पूछिए। आँख खुल जाएंगे। दिन में तारे नजर आयेंगे।
कक्काजी चिंता में है। बिगड़ते हालात पर ।बढते अपराध पर। आये दिन लूट – हत्या से मन बजबजाया है। सोंच रहे हैं ! यह कैसा सुशासन आया है। तंत्र तो भूल बैठा है। अपराधियों ने नीतीश का फार्मूला अपनाया है। स्व अभ्यास का। न्याय के साथ विकास का। किसको छोड़ रहे। उँच -नीच , अमीर – गरीब सबको लूट रहे।दुष्कर्म में भी बच्ची, जवान, बुढी तक साझा है। गोली भी जात – धर्म ,भेद-भाव नहीं देख रहा। लाख दो लाख की कौन कहे, गोली बात- बात पर चल रहा। सब्जी – मोबाइल विक्रेता से लेकर भटठा संचालक गोली खा रहा। दागी- बागी – बेईमान का मर्डर तो बोनस है। अब क्या करे प्रशासन ! क्या करे सरकार ?
हथियार उठाने की है दरकार! भुजंगी ने राह सुझाई। बीते हालात एक सांस में कह सुनाई। गोलू कांड से जलता शहर। तब लूट अपहरण हत्या, बलात्कार, अत्याचार होता था दिन दोपहर। आरके ने गन उठाया। धीरज, गुडडू, टुनटुन ,निक्की , दिनेश, साकेत, अर्जुन आदि को टपकाया। अपराधी था थर्राया। शहर ने सकून पाया।
पहले भी “भट्टी” के राज में अपराध सकपकाया था। उटकुन मुटकुन की कौन कहे तब छोटन,भुटकुन, सम्राट, बृजबिहारी तक ने अलग बसेरा बनाया था। तब कई हनुमान घुमे थे बिन वरदान। जो चढ़े थे बर्फ़ पर लिटाए गये । जबरन बढ़े तो गोली खाए । आगे की हालत भी देख ले श्रीमान ।जिसने शहाबुद्दीन को झुकाया था । उसी “रत्न” ने जिले में “सुशासन” का “अलख” जगाया था। अपराध तब भी होता था! लेकिन डर दोनों तरफ होता था । भय का माहौल नहीं था। जो बजबजाते थे । इलाज पाते थे । कानूनी डंडा से सहम जाते थे ।
फिर अपराध क्यों बढी ? अपराधी कैसे तन गए ! कक्काजी से रहा न गया ।
लालच ! जब पैसे के आगे गिरवी रखोगे साख। कदम – कदम खाओगे लात ! देखा नहीं ऑटो चालकों ने दौडा दौडा कर नाके पर जवान को “कूट” डाला था। ब्रह्मपुरा में चलते दरोगा को “लूट” डाला था ! थाने पर चढ़ जाना आम बात हो गई है । ट्रैफिक सिग्नल पर पुलिस से भिड़ जाना बात की बात हो गई है। भुजंगी बोला। गुरु जब भय ही नहीं होगा तो भूत कैसे भागेगा!
तुम ठीक कह रहे हो। चाह बन गयी थी परीक्षा में चोरी बंद हो गयी थी । दीपिका के समय सिर पर हेलमेट न होना मानो अनहोनी हो गयी थी। आरके ने ठाना तो सड़क जाम करना मुश्किल था। डीएम ने चाहा तो समाहरणालय पार करना मुश्किल है। चाह बनी तो जज के आगे सड़क साफ है। जाने क्यों थाने के अगल बगल “अतिक्रमण” हाथोंहाथ है।
जबाब आपके सामने है गुरु। जहाँ चाह है वहीं राह है। चाह बना लो आप “सूई” तक ढूंढ लाते हो। राह बना दो ट्रक के ट्रक “शराब” पार कराते हो। खुद “खाते” हो, “पीते” हो, “पत्रकार” तक को “खिलाते – पिलाते” हो। जब्त शराब तक “बेचवाते” हो। क्या पता लूट – हत्या – अपहरण में भी बड़ी “भागीदारी” हो …..?
लेकिन कानून !
कानून की ऐसी की तैसी। वो तो सरकार बनाती है।अवाम को जताती है। हमको क्या दिलाती है। कोरा ईमान। जो खुद हैं बेईमान। बेईमानी हमारे नाम ! धंधा खुद से कराती है।
यानी ?
सब मिले हैं साईं ! चोर – चोर मौसेरा भाई।

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