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बिन पढ़ाई “साहेब” परीक्षा कैसी … कह रहिन कक्काजी – मनोज

बिन पढ़ाई “साहेब” परीक्षा कैसी … कह रहिन कक्काजी /मनोज

कोरोना ! कोरोना ! कोरोना! जित देखो कोरोना। कुछ कहो ना। कुछ सुनो ना। बस कोरोना। जबसे कोरोना की बारिश हुई है। सब एक रंग में नहाया है। कोरोना के रंग। चाहे जीवन शैली हो या आचार व्यवहार। सब कोरोना के मुताबिक चल रहा है।लोग दिखे डरे – डरे ! सहमे – सहमे ! मुँह पर मास्क ! नजरों के पहरे। छींक से भय।
सड़कें सुनी । सुनी रही मंडी। सब्जी का हो । खाधान, सर्राफ़ा या फिर रंडी। आदमी से दूरी । मिलने से परहेज का अंडर स्टैन्डिन्ग । लोग पालन कर गये सोशल डिसटेंसिंग । हालांकि राजनीत ने अपना पल्ला झाड़ लिया । जब जैसे मन किया । कोरोना में जिया । सरकार का राज था। कोरोना के नाम का भय दिखाया। लोगों से ताली पिटवाया। थाली पिटवाया। दीप जलवाया। घर में कैद करवाया। लोगों को पैदल चलवाया । स्कूल – काॅलेज सब बंद करवाया। रोजी – रोजगार चौपट करवाया। लेकिन चुनावी सभा ! मतदान ! मतगणना!मनचाहे ढंग से कराया। अपनी सोंच समझ से वाहन चलवाया । हवाई जहाज उड़वाया। ट्रेन चलवाया। अब तो बसें भी चलने लगी है। किस्तों में स्कूलें भी खुलने लगी है। दहशत का रंग बदलने लगा है। बदहाल जिंदगी धीरे धीरे सही । पटरी पर चलने लगा है।
कक्काजी सोंच रहे थे। कोरोना पर। वायरस भी क्या चीज है। सरकार करे तो राहत। हम करें तो आहत । सोंच रहे थे सोशल डिसटेंस के मायने। चुनाव के दौरान कहाँ – कहाँ दिखा था ? पीएम की सभा या मंत्री की रैली में ? सीएम के संग में या नेता विपक्ष की जंग में ? कहीं कोई रोक टोक भी था क्या ? आयोग का काम था कहना। कह गया। सोशल डिसटेंसिंग । कोरोना से बचके रहना। कहीं कोई जांच। कोई निर्देश। बस संदेश। दिवालों पर। सवालों में। न कोई गिरफ्तारी। न कोई जुर्माना। सभाओं में लोग पिले रहे। वनमानुष की तरह । मास्क उड़ रहा था । पतिंगे की तरह।
उनकी हैरत और बढ़ी। ट्रेन के सफर पर। भेड़ – बकरी की तरह मजदूर लादे गये। भूखे – प्यासे शहर से गांव पहुँचाये गये। तब कोरोना किस बिल में थी। किसी ने बताया नहीं। जताया नहीं। बसों का सफर भी दो रंगों में जारी है।निजी में नियमावली। सरकारी में आदमी को आदमी थामें खड़ा है। कूल – कूल। वंडरफूल।
तभी भुजंगी बहका – बहका आकर चहका ।
अब तो स्कूलों को भी खोलने की तैयारी है।
क्या कह रहे हो? काटो तो खून नहीं। कक्काजी चौंके।
हाँ गुरू जी। पढाई गयी तेल लेने। सीधा परीक्षा की तैयारी है।
यह कैसे होगा? बच्चो का भविष्य तो चौपट होगा!कक्काजी ने सवाल खड़ा किया।
इसकी फिक्र किसे है गुरूवर। फलता रहे बस फलदार तरूवर । सरकार की इतनी चाह है। संस्थाओं को बचाने की यही राह है। उनका कहना है सत्र पिछड़ जायेगा। बच्चो को पास कर देंगे। कोई पुछे तो ऐवरेज मार्किंग कर देंगे। यों भी आनलाईन क्लास चला है। भुजंगी ने बताया।
अरे बुरबक। आनलाईन का अपना फंडा है। यह तो स्कूल मैनेजमेंट का फीस लेने का धंधा है। जिस घर में रोटी नहीं। तन पे लंगोटी नहीं। वहां मोबाइल। इंटरनेट की बात बेमानी है। दो- चार – दस – बीस को छोड़ दें तो दावा है ऐसी क्लास मनमानी है। बच्चों ने देखा – सोंचा – समझा- पढा क्या । पहले ले लो परीक्षा! सच के वजूद का। जहाँ बाढ़ की विभीषिका थी। बारिश का दंश था। कोरोना दिवानी थी। बच्चा पढ़ता कहां है अपने मन से। माता पिता ने औलाद बचाने की ठानी थी। ऐसे में यह परीक्षा सौ फीसदी बेमानी है। यों लगता है सरकार ने “मन की बात” की तरह अपनी जिद जताने की ठानी है। जरूरत थी “2020” को आपदा बताने की। नया सत्र चलाने की। बच्चों की फीस माफी। जमकर पढाई कराने की।
वह परीक्षा कैसी जो सवाल हल न करा सके। ऐसी पढाई से क्या फायदा जो ज्ञान की ज्योति जला न सके।
भुजंगी चहका। गुरु सब चढ़ावा- दिखावा का खेल है। यह पढाई- स्कूल – कालेज अब बना धंधा है।प्रबंधन की कौन कहे सरकार भी अंधा है। परीक्षा की “विवशता” में फीस जो चुकायेंगे। बच्चे पढ़े न पढ़े “पास” तो कर जाएंगे। अच्छे दिन के आसरे “चाय- पकौड़ी” बेच खायेंगे। “कालाधन” वापस लाएंगे।

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