भारत में हर दशक के साथ ही युवाओं के लिए उच्च-शिक्षा की डगर कठिन होती गई है. पिछले साल उच्च-शिक्षा को लेकर सरकार के नीतिगत दृष्टिकोण में आया परिवर्तन और कुछेक वर्षों से इस क्षेत्र के प्रति बरती जा रही उदासीनता नई चुनौतियों की तरफ इशारा कर रही हैं. दरअसल, किसी क्षेत्र में सुधार तभी संभव है जब हम उसकी असल चुनौतियों को पहचान करते हैं. यदि उच्च-शिक्षा प्रणाली की असल चुनौतियों को पहचानना है तो हमें कुछ दशक पीछे जाना होगा.
अस्सी का दशक तक केंद्र सरकार अपनी नीति में अनुदान को प्राथमिकता देती थी. हालांकि, अस्सी के दशक से ही बिना अनुदान की नीति को बढ़ावा दिया जाने लगा था. लेकिन, 2010 का दशक आते-आते स्थिति यह हो गई कि केंद्र सरकार ने उच्च-शिक्षा में बिना अनुदान की नीति को स्वीकार कर लिया. इसका परिणाम यह हुआ कि सार्वजनिक क्षेत्र की उच्च-शिक्षा में गुणवत्ता का स्तर खराब होता गया और शिक्षा का बाजारीकरण सामने आया. इससे सामान्य परिवारों के लिए शिक्षा साल-दर-साल मंहगी होती चली गई. असल में उच्च-शिक्षा का निजीकरण और व्यापारीकरण ही इस क्षेत्र का सबसे बड़ा संकट है और पिछले साल नई शिक्षा नीति आने के साथ ही अब यह और अधिक तेज होगा.
उच्च-शिक्षा की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए पीछे जाएं तो वर्ष 2004 में ‘निजी विश्वविद्यालय विधेयक व अध्यादेश’ आने के बाद बड़ी तादाद में निजी विश्वविद्यालय की स्थापना को बढ़ावा मिला था. अब हालत यह है कि वर्ष 2018-19 में केंद्र के उच्च-शिक्षा विभाग के अखिल भारतीय उच्च-शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार देश भर में 385 निजी विश्वविद्यालय हैं.
दूसरी तरफ, केंद्र सरकार का उच्च-शिक्षा के निवेश में साल-दर-साल कटौती किए जाने से गरीब परिवारों के बच्चों के लिए परिस्थिति पहले से विकट हुई हैं. इसकी पुष्टि केंद्र द्वारा शिक्षा के लिए दिए जाने वाले बजट का आकलन करने से होता है. केंद्र ने वर्ष 2014-15 के दौरान अपने बजट में शिक्षा पर 4.1 प्रतिशत हिस्सा खर्च करने का प्रावधान किया था. फिर, वर्ष 2015-16 में 3.79, वर्ष 2016-17 में 3.66 प्रतिशत, वर्ष 2017-18 में 3.71 प्रतिशत और वर्ष 2018-19 में 3.54 प्रतिशत में केंद्र ने अपने बजट में शिक्षा पर खर्च करने का निर्णय लिया. जाहिर है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान केंद्र सरकार ने शिक्षा पर किए जाने वाले निवेश को बढ़ाने की बजाय इसमें लगातार कटौती की है. इसलिए, उच्च-शिक्षा में दूसरी सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी सुविधाओं का अभाव और गुणवत्ता में आई कमी है. यही वजह है कि सार्वजनिक उच्च-शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापकों के लिए बड़ी संख्या में पद खाली हैं.
इसके अलावा, अगले वर्ष उच्च-शिक्षा के नजरिए से विश्वविद्यालय में संबद्ध महाविद्यालय का बढ़ता बोझ, पाठ्यक्रमों में बदलाव की मांग और ड्रापऑउट विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या असली चुनौतियां हैं जिनका संबंध भी कहीं-न-कहीं सार्वजनिक शिक्षा के ढहते ढांचे और निजीकरण से ही है. वहीं, उच्च-शिक्षा में अध्यापकों के रिक्त पद से जुड़े आंकड़े खुद अपनी हकीकत बता रहे हैं. इस समय नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 50 प्रतिशत रिक्त पद है. इसी तरह, आईटीटी में 35 प्रतिशत और राज्यों के विश्वविद्यालयों तथा इनसे संबद्ध कॉलेजों में 40 प्रतिशत तक रिक्त पद हैं. यह स्थिति तब है जब कई आयोग और समितियों ने समय-समय पर उच्च शिक्षा में 100 प्रतिशत रिक्त पदों को भरने की सिफारिशें की हैं. यहां तक कि इस मामले में उच्च और सर्वोच्च न्यायालय भी हस्तक्षेप कर चुके हैं. इसके बावजूद पिछले एक दशक से शासन स्तर पर रिक्त पदों की नियुक्तियों को लेकर लगातार अनदेखी बरती जा रही है. इसका बुरा असर उच्च शिक्षा और शिक्षण की गुणवत्ता पर पड़ा है.
वहीं, भारत में अनुसंधान और नवाचार में भी निवेश घटता जा रहा है. वर्ष 2008 में कुल बजट का 00.84 प्रतिशत राशि अनुसंधान और निवेश में खर्च किया गया था. लेकिन, इस क्षेत्र में खर्च की जाने वाली राशि पिछले बजट में घटते हुए 00.69 पर आ चुकी है. यही वजह है कि देश में शोधकर्ताओं की संख्या भी लगातार घटती जा रही है.
यदि हम विश्वविद्यालयों द्वारा तैयार किए गए पाठ्यक्रम की बात करें तो इसमें और सामाजिक व्यवहार के बीच भी कोई तालमेल नहीं दिखता है. दरअसल, उच्च शिक्षा की अध्ययन सामग्री उपयोगी और मानवीय आवश्यकताओं पर आधारित कौशल विकास को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए. इसी प्रकार, उच्च शिक्षा से ड्रापआउट होने वाले विद्यार्थियों को रोकना और सकल नामांकन अनुपात बढ़ाना भी इस क्षेत्र की एक बड़ी चुनौती है. भारत की उच्च शिक्षा में 18 से 23 वर्ष की आयु-वर्ग के अंतर्गत सकल नामांकन अनुपात महज 26.3 प्रतिशत है, जो कि अन्य विकसित और कई विकासशील देशों की तुलना में बहुत कम है. इससे स्पष्ट होता है कि आज भी देश के करीब 74 प्रतिशत युवा उच्च शिक्षा से बाहर हो जाते हैं. इससे जाहिर होता है कि सभी वर्गों के विद्यार्थियों को समान अवसर देना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना आज भी दूर का सपना है.
बता दें कि भारत जब स्वतंत्र हुआ था तब 20 विश्वविद्यालय और 500 कॉलेज थे. वर्तमान में 900 से अधिक विश्वविद्यालय और करीब 40 हजार कॉलेज हैं. संख्या की दृष्टि से उच्च शिक्षा में विकास होता दिखता है, लेकिन गुणवत्ता के मानकों पर यह दुनिया के अनेक देशों के मुकाबले पीछे है. ताजा क्यूएस वर्ल्ड रैंकिंग में पहले सौ के भीतर भारत का एक भी उच्च शिक्षा संस्थान का न होना इस बात पुष्टि करता है. इसके बाद 100 से 200वीं रैंकिंग में हमारे देश के महज तीन और 200 से 500वीं रैंकिंग में महज पांच उच्च शिक्षा संस्थानों का होना पूरी कहानी बयान कर देता है.
भारत की नई शिक्षा नीति उच्च शिक्षा संस्थानों के पुनर्गठन और एकत्रीकरण की सिफारिश करती है. इसके मुताबिक यदि किसी शिक्षा संस्थान में विद्यार्थियों की संख्या कम है तो उसका किसी अन्य शिक्षा संस्थान में विलय कर दिया जाएगा. ऐसा हुआ तो आशंका यह है कि देश के दूरदराज के क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के प्रसार और प्रोत्साहन का कार्य रुक जाएगा तथा इससे कई ग्रामीण, पहाड़ी और जनजातीय अंचल के शिक्षा संस्थान बंद हो जाएंगे. कोरोना वैश्विक महामारी के दौरान इन क्षेत्रों के विद्यार्थियों की पढ़ाई पहले ही बुरी तरह प्रभावित हुई है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षण का लाभ उन विद्यार्थियों को ही मिला है जो सर्वसम्पन्न और टेक्नोफ्रेंडली हैं. इससे उच्च शिक्षा से जुड़ी बुनियादी संरचना की कमजोरियां सतह पर आई हैं. वहीं, यह भी नई चुनौती है कि कोरोना-काल में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थियों का एक बड़ा वर्ग पढ़ाई से छूट गया है.
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सुधार से पहले इस बात को समझने की आवश्यकता है कि इसे लाभ का धंधा नहीं बनाया जा सकता है. उच्च शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को एक अच्छा नागरिक बनाना होना चाहिए जो विकास के साथ ही सामाजिक न्याय के लिए अच्छी तरह से अपना योगदान दे सके. इसलिए, शिक्षा के व्यवसायीकरण और निजीकरण को बढ़ावा देने वाली नीति पर आगे बढ़ने की बजाय सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता देने वाली योजनाओं की आवश्यकता है. यही वजह है कि कोठारी आयोग ने सार्वजनिक शिक्षा के क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत खर्च करने की सिफारिश की थी. लेकिन, आज सरकार के स्तर पर इस सिफारिश को लागू करने की प्रवृति नहीं दिख रही है.
असल में नए साल में यदि भारतीय उच्च-शिक्षा प्रणाली की चुनौतियों का सामना करना है तो सबसे पहले इन्हें पहचानना आवश्यक है. इसके अनुरूप यदि नीति निर्धारक अपनी इच्छाशक्ति दिखाते हैं और भविष्य में सभी के लिए समान रुप से नि:शुल्क, अनिवार्य तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसर जुटाते हैं तो आमूलचूल परिवर्तन की संभावना बनेगी.






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