नई दिल्ली. डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (DRDO) द्वारा तैयार की गई कार्बाइन सेना के इस्तेमाल के लिए अब बिल्कुल तैयार है. इस कार्बाइन को DRDO की पुणे लैब और ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड ने मिलकर बनाया है. ये कार्बाइन अपने सभी मानकों पर खरी उतरी है और इसका फाइनल ट्रायल सफल रहा है.
यह कार्बाइन न केवल वर्तमान में सेना द्वारा इस्तेमाल हो रही 9 एमएम कार्बाइन का स्थान लेगी बल्कि सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज जैसे सीआरपीएफ, बीएसएफ और राज्य पुलिस बलों के शस्त्रागारों को आधुनिक और नई तकनीक से लैस भी करेगी. इस कार्बाइन का पहला मकसद बिना किसी दुर्घटना के टारगेट को निष्क्रिय करना है.
यह कार्बाइन जॉइंट वेंचर प्रोटेक्टिव कार्बाइन यानि जेपीवीसी एक गैस चालित सेमी ऑटोमेटिक हथियार है. कार्बाइन वह हथियार है जिसका बैरल राइफल से छोटा होता है. इसे भारतीय सेना जनरल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट के आधार पर तैयार किया गया था. यह कार्बाइन डीआरडोओ की पुणे स्थित लैब आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ARDE) में भारतीय सेना के जीएसक्यूआर के आधार पर डिजाइन की गई है. खास बात है कि ये कार्बाइन पहले ही Ministry of Home Affairs ट्रायल्स को सफलतापूर्वक पूरा कर चुकी है.
DRDO और OFB ने मिलकर किया तैयार
JVPC को पुणे की DRDO फैसेलिटी और कानपुर की ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड Ordnance Factory Board-OFB ने मिलकर तैयार किया है. इस कार्बाइन का निर्माण SAF यानि स्मॉल आर्म्स फैक्टरी कानपुर में किया जाएगा. इसके लिए गोलियां पुणे की एम्यूशन फैक्टरी में तैयार होंगी. 1980 के आखिर में ARDE (Armament Research & Development Establishment) ने 5.56 x 45 mm क्षमता के हथियारों को बनाना शुरू किया था. इसे INSAS यानी इंडियन स्मॉल आर्म्स सिस्टम नाम दिया गया. इस तरह के हथियारों में रायफल और लाइट मशीनगन यानी LMG भी शामिल थी. INSAS पर कई तरह के टेस्ट किए गए. कई तरह के वातावरण में इनको इस्तेमाल किया गया और 1994 में लॉन्च किया गया.
ऐसे बनी अति आधुनिक कार्बाइन
INSAS तकनीक से बने हथियार में कुछ गंभीर खामियां रहीं लेकिन ये हथियार अभी भी आर्म्ड फोर्सेस द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं. हालांकि सशस्त्र दल कुछ अन्य विदेशी और देसी स्मॉल आर्म्स का इस्तेमाल भी करते हैं. INSAS की तकनीक पुरानी है. INSAS हथियारों में कार्बाइन भी शामिल थी लेकिन इसको विकसित नहीं किया गया था.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2005-2006 में ARDE ने एक मल्टी कैलिबर इंडीविजुअल वेपन सिस्टम पर काम शुरू किया था. इसमें इंटरचेंजेबल बैरल का इस्तेमाल किया जाना था. हालांकि इस पर बहुत काम नहीं किया जा सका था. साल 2010 से 2015-2016 के बीच, सशस्त्र बलों ने एक कार्बाइन की मांग की. इसके लिए ARDE और OFB को साथ मिलकर काम करने को कहा गया, और इस तरह इन दोनों संस्थानों ने मिलकर JVPC यानी यह अति आधुनिक कार्बाइन विकसित की. इसके लिए कुछ पुराने तकनीकी फीचर्स को आधार बनाकर काम करना शुरू किया गया. 2016-2017 से इसके परीक्षण शुरू किए गए.
आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत हथियार
अभी तक ये JVPC, इनीशियल डवलपमेंट ट्रायल्स, प्री-यूज़र इंटरनल ट्रायल्स, यूजर ट्रायल्स और DGQA यानी डायरेक्टर जनरल ऑफ क्वालिटी एश्युरेंस के ट्रायल्स से गुजर चुकी है. DRDO के एक वैज्ञानिक ने कहा कि इस हथियार का रखरखाव आसान होगा. उन्होंने बताया कि इसे नजदीकी लड़ाई या CQB ऑपरेशन्स को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है. फायरिंग के दौरान यह इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को यह स्थिर रखने में सक्षम होगी.
इसकी रेंज 100 मीटर से अधिक है और इसका वजन मात्र तीन किलो है. 100 मीटर की दूरी तक इसकी गोलियां 3.5MM मोटी स्टील और 23 लेयर वाले कवच को भी भेद सकती हैं. वजन इतना कम है कि इसे एक हाथ से भी चलाया जा सकता है. कार्बाइन की डिजायन इस तरह से की गई है कि यह आतं’कवाद के खि’लाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकती है. ये JVPC गृह मंत्रालय के ट्रायल्स पास कर चुकी है. जल्द ही ये सशस्त्र बलों के शस्त्रागार में शामिल होगी.





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