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सियासत का एक चमकदार सितारा हुआ अस्त

राजनीति की वर्तमान पीढ़ी का एक चमकता सितारा अस्त हो गया। वैसे तो वे सदा राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे लेकिन देखा जाए तो बिहार में कर्पूरी ठाकुर, कैलाशपति मिश्र के बाद वाली पीढ़ी के सर्वाधिक चमकदार और चर्चित चेहरा थे।वैसे तो दलित नेता के तौर पर देश में सबसे बड़ा नाम बाबू जगजीवन राम का है लेकिन उन पर यह आरोप लगता रहा की उन्होंने कभी दलितों की सुध नहीं ली न उन्हें सम्मान देने का कार्य किया लेकिन रामविलास पासवान दलित नेता के रूप में ही उभरे और वे गर्व से कहते थे कि मैं दलित हूं। और दलितों के हक के लिए सदा आवाज भी बुलंद करते रहे।

सत्ता किसी की भी हो हनक कायम रहती, 6 पीएम के साथ किया काम

सत्ता किसी की भी हो पर रामविलास पासवान की हनक कम नहीं रहती थी। उन्होंने छह प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया। सियासत की नब्ज पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। इसी कारण लालू प्रसाद ने उनको ‘मौसम विज्ञानी’ का नाम दिया था। रामविलास पासवान खुद भी स्वीकार कर चुके थे कि वह जहां रहते हैं सरकार उन्हीं की बनती है। मतलब राजीतिक मौसम का पुर्वानुमान लगाने में वे माहिर थे। चुनाव के पहले ही हवा का रुख भांप लेने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। वे राजनीति के अजात शत्रु थे।

सभी दलों के नेताओं से उनके आत्मीय संबंध थे। दलित समुदाय से आने के बावजूद वे सभी दलों के लिए हर समय प्रासंगिक रहे। इसके अलावा रामविलास पासवान देश के एकमात्र ऐसे नेता थे, जिनका नाम दो दो बार गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल हुआ। राजनरायन, जयप्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर जैसे सोशलिस्ट नेताओं के काफी करीबी रहे थे रामविलास पासवान। 1969 में वे पहली बार संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से विधायक बने। 1974 में उन्हें लोकदल का महासचिव बनाया गया। उसी साल जयप्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रान्ति का आन्दोलन आकार लेने लगा था…फिर क्या था वे भी उस आन्दोलन में कूद पड़े। जेल यात्रा भी की।

गिनीज बुक में अपना ही रिकॉर्ड तोड़ा

रामविलास पासवान ने हाजीपुर संसदीय सीट से दो बार विश्व रिकॉर्ड बनाया। 1977 में अपने पहले ही लोकसभा चुनाव में 4.24 लाख मतों से जीतकर अपना नाम गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करवाया। फिर 1989 में कांग्रेस के महावीर पासवान को 5 लाख 4 हजार 448 से हराकर गिनीज बुक में अपना ही रिकॉर्ड तोड़ डाला।

साधारण परिवार से राष्ट्रीय ऊंचाई तक का सफर

खगड़िया के शहरबन्नी गांव में एक साधारण परिवार में जन्मे श्री पासवान ने छात्रसंघ से राजनीति में कदम रखा था। वह जेपी आंदोलन में भी बिहार में मुख्य किरदार थे। वे देश के दलितों की हित के लिए संघर्ष करते रहे। मृदुभाषी होने के कारण सभी के दिल में उनके लिए जगह थी।

पहली बार 1969 में वह विधायक बने। 1977 में पहली बार मतों के विश्व रिकॉर्ड के अंतर से जीतकर लोकसभा पहुंचने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। केंद्र में एनडीए की सरकार हो या यूपीए की, उनका महत्व समान रूप से बना रहा। वे सभी के लिए सदैव प्रासंगिक बने रहे।

अपने बूते इतनी ऊंचाई पर पहुंचे

रामविलास पासवान ने खगड़िया के काफी दुरुह इलाके शहरबन्नी से निकलकर दिल्ली की सत्ता तक का सफर अपने संघर्ष के बूते तय किया था। इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लिहाजा वह पांच दशक तक बिहार और देश की राजनीति में छाये रहे।

मंत्री पद का ऑफर लेकर खुद सोनिया गांधी उनके घर गई थी

मृदुभाषी रामविलास पासवान देश के छह प्रधानमंत्रियों की कैबिनेट में मंत्री रहे। राजनीति की नब्ज पर उनकी पकड़ इस कदर रही कि वह वोट के एक निश्चित भाग को इधर से उधर ट्रांसफर करा सकते थे। यही कारण है कि वह राजनीति में हमेशा प्रभावी भूमिका निभाते रहे। इनके राजनीतिक कौशल का ही प्रभाव था कि उन्हें यूपीए में शामिल करने के लिए सोनिया गांधी खुद चलकर उनके आवास पर गई थीं। उनका सिद्धान्त था ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ और इसे जीवन भर चरितार्थ भी किया। वे समाजवादी पृष्ठभूमि के बड़े नेताओं में से एक थे। देशभर में उनकी पहचान राष्ट्रीय नेता के रूप में रही। बावजूद उनका बिहार से कभी जुड़ाव कम नहीं हुआ।

अपनी शर्त न मानने पर बिहार में किसी की भी सरकार नहीं बनने दी

वर्ष 2005 में बिहार की सत्ता की चाबी रामविलास पासवान के हाथ लग गई। उस समय उनकी पार्टी के 29 विधायक जीतकर आए थे। किसी दल को बहुमत नहीं होने के कारण सरकार नहीं बन रही थी। पासवान अगर उस समय नीतीश कुमार के साथ या लालू प्रसाद के साथ जाते तो प्रदेश में सरकार बन सकती थी। मगर उन्होंने शर्त रख दी कि जो पार्टी अल्पसंख्यक को मुख्यमंत्री बनाएगी उसी का साथ वह देंगे। उनकी इस शर्त पर कोई खरा नहीं उतरा और दोबारा चुनाव में जाना पड़ा। बाद में उसी साल नवम्बर में हुए चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को बहुमत मिला और सरकार बनाई।

2009 में हार गए थे रामसुंदर दास से लोकसभा चुनाव

रामविलास पासवान 2004 के लोकसभा चुनाव जीते, पर 2009 में हार गए। 2009 में पासवान ने लालू प्रसाद की पार्टी राजद के साथ गठबंधन किया। पूर्व गठबंधन की सहयोगी कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया। 33 वर्षों में पहली बार वे हाजीपुर से जनता दल के रामसुंदर दास से चुनाव हार गए। उनकी पार्टी लोजपा 15वीं लोकसभा में कोई भी सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी। साथ ही उनके गठबंधन के साथी और उनकी पार्टी भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई और 4 सीटों पर ही सिमट गई।

लालू की बदौलत राज्यसभा पहुंचे

उस समय लालू के सहयोग से वह राज्यसभा में पहुंच गये। बाद में हाजीपुर क्षेत्र से 2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वह फिर से एनडीए में आ गए और संसद में पहुंकर मंत्री बने। उसी चुनाव में बेटा चिराग भी पहली बार जमुई से सांसद बना।

1983 में बनाई दलित सेना

1975 में जब देश में आपातकाल की घोषणा की गई तो रामविलास पासवान को गिरफ्तार कर लिया गया। 1977 में रिहा होने पर वे जनता पार्टी के सदस्य बन गए और पहली बार इसके टिकट पर हाजीपुर से संसद पहुंचे। वे 1980 और 1984 में हाजीपुर निर्वाचन क्षेत्र से 7वीं लोकसभा के लिए चुने गए। 1983 में उन्होंने दलित मुक्ति और कल्याण के लिए एक संगठन दलित सेना की स्थापना की। 1989 में लोकसभा के लिए फिर से चुने गए और उन्हें विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में केंद्रीय श्रम और कल्याण मंत्री बने। उसी समय मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गईं। 1996 में उन्होंने लोकसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन का भी नेतृत्व किया, क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा राज्यसभा के सदस्य थे। उसी साल वे पहली बार केंद्रीय रेल मंत्री बने। उन्होंने 1998 तक उस पद को संभाला। इसके बाद वे अक्टूबर 1999 से सितंबर 2001 तक केंद्रीय संचार मंत्री रहे, जब उन्हें कोयला मंत्रालय में स्थानांतरित किया गया और वे इस पद पर अप्रैल 2002 तक बने रहे।

वर्ष 2000 में लोजपा का गठन किया

2000 में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) बनाने के लिए वे जनता दल से अलग हो गए। 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद पासवान यूपीए में शामिल हो गए और यूपीए सरकार में उन्हें रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय और इस्पात मंत्रालय में केंद्रीय मंत्री बनाया गया।

जीवन परिचय

रामविलास पासवान का जन्म 5 जुलाई 1946 में हुआ था। उनका पैतृक गांव खगड़िया जिले के अलौली स्थित शहरबन्नी गांव है। उनकी शादी 1960 में राजकुमारी देवी के साथ हुई थी। बाद में 1981 में उन्हें तलाक देकर दूसरी शादी 1983 में रीना शर्मा से की। उनकी दोनों पत्नियों से तीन पुत्रियां और एक पुत्र है। उन्होंने कोसी कॉलेज खगड़िया और पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की। पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने एमए और लॉ ग्रेजुएट की डिग्री ली। वह नॉनवेज पसंद करते हैं। मछली उनकी पहली पसंद थी।

बड़े फैसले

हाजीपुर में रेलवे का जोनल कार्यालय खुलवाए
केन्द्र में अंबेडकर जयं ती पर छुट्टी घोषित कराई

कब किस विभाग के बनें केन्द्रीय मंत्री

*1989 में केन्द्रीय श्रम मंत्री
*1996 में रेल मंत्री
*1999 में संचार मंत्री
*2002 में कोयला मंत्री
*2014 में खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री
*2019 में खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री

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