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बात के बीच नेपाल की शातिर चाल, कालापानी पर नक्शे के बाद किताब निकालने को तैयार

नई दिल्ली
नेपाल एक तरफ तो भारत के साथ हाल के दिनों में बढ़ी तल्खी को कम करने की कोशिश करता दिख रहा है लेकिन दूसरी तरफ वह कालापानी के मसले को गरमाने की भी तैयारी में है। इंटेलिजेंस एजेंसी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक नेपाल सरकार कालापानी पर अपना दावा जताने के लिए एक किताब निकालने की तैयारी कर रही है जिसे एंबेसी के जरिए कई अलग अलग देशों में भेजा जाएगा। ताकि कालापानी पर नेपाल के दावे को लेकर वह दूसरे देशों की सहानुभूति हासिल कर सकें।

इंटेलिजेंस एजेंसियों को यह भी जानकारी मिली है कि नेपाल गूगल से बात कर उसे इस बात पर राजी करने की कोशिश कर सकता है कि वह नेपाल के वर्जन वाला मैप भी दिखाए। नेपाल ने कुछ वक्त पहले ही अपने नए नक्शे को मंजूरी दी है। जिसमें कालापानी के साथ ही भारत के इलाके लिपुलेख और लिम्पयाधुरा को भी नेपाल का हिस्सा दिखाया गया है।

कालापानी पर नेपाल का ‘प्लान’
सोमवार को भारत और नेपाल के अधिकारियों की मीटिंग हुई, जिसमें सकारात्मक रुख दिखा। उसमें संकेत दिया गया कि दोनों देशों के बीच विदेश मंत्री स्तर की बातचीत भी जल्द हो सकती है। हालांकि नेपाल कालापानी को लेकर अपने तेवर तीखे करने की तैयारी में है। इंटेलिजेंस एजेंसी सूत्रों के मुताबिक नेपाल सरकार कालपानी मुद्दे पर किताब पब्लिश करने की तैयारी कर रही है। यह किताब अंग्रेजी में होगी और इसमें कालापानी को लेकर नेपाल के दावे को बताया जाएगा। इस किताब में कुछ ऐेसे कथित तथ्य भी दिए जाएंगे जो कालापानी पर नेपाल के दावे की पुष्टि करने की कोशिश करेंगे। इंटेलिजेंस एजेंसी सूत्रों के मुताबिक नेपाल सरकार इस किताब को अलग अलग देशों के एंबेसी में बांटने की योजना बना रही है ताकि एंबेसी के जरिए अलग अलग देशों तक यह किताब पहुंच सके। वह ये किताब युनाइटेड नेशंस को भी दे सकते हैं।

कालापानी पर लंबे समय से रहा है विवाद
कालापानी शुरू से ही भारत और नेपाल के बीच विवाद का केंद्र रहा है। कालापानी को भारत काली नदी का उद्गम मानता है। जबकि नेपाल का मानना है कि काली नदी का उदगम लिम्पयाधुरा से निकलने वाली कूटी-यांग्ती नदी से होता है। नेपाल ने 1990 से ही कालापानी पर अपना दावा जताना शुरू कर दिया था। 8 मई को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए लिपुलेख के पास तक की एक सड़क का उद्घाटन किया। यह सड़क बीआरओ ने बनाई है। इसके बनने के साथ ही पहली बार चीन बॉर्डर के इतना करीब तक गाड़ियां जाने का रास्ता बना। लिपुलेख दर्रे से पांच किलोमीटर पहले तक सड़क बन गई है। इसके उद्घाटन के बाद से ही नेपाल ने इस पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी।

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