रोज 10 किलोमीटर चलकर रागिनी ने फैलाई चमकी पर जागरूकता
• तेज गर्मी और धूप में भी घर-घर दी चमकी की जानकारी
• 2005 में रागिनी आशा के रुप में हुई थी चयनित
मुजफ्फरपुर। 25 जून
कोविड-19 संक्रमण के साथ एक्यूट इन्सेफ़लाईटिस सिंड्रोम( एईएस) यानी चमकी बुखार से समुदाय को सुरक्षित रखना सरकार के लिए दोहरी चुनौती है. लेकिन अभी तक जिले में कोविड-19 के साथ एईएस पर प्रभावी नियंत्रण जिले के लिए अच्छी खबर है. इन चुनौतियों के बीच मड़वन प्रखंड के बड़का गांव की आशा फैसिलेटर रागिनी कुमारी की भूमिका काफी सराहनीय है. रागिनी पिछले 15 वर्षों से समुदाय में एईएस की अलख जगा रही हैं. इससे क्षेत्र में रागिनी अपने कार्यों को लेकर काफ़ी लोकप्रिय भी हैं.
15 वर्षों से चमकी पर जागरुक कर रही हैं रागिनी:
रागिनी ने बताया चमकी के बारे में वह लोगों को 15 वर्षों से जागरुक कर रही हैं. पिछले वर्ष भी जागरुकता में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई थी, पर भयावह गर्मी ने बच्चों को परेशान किया था. पिछले वर्ष मड़वन प्रखंड में लगभग 50 बच्चे एईएस से पीड़ित हुए थे। सुखद बात यह थी कि सभी बच्चे स्वस्थ हो गये थे। उन्होंने बताया इस वर्ष अभी तक सिर्फ 1 एईएस पीड़ित ही प्रखंड से मिला है। यह इसलिए संभव हो सका है क्योंकि वर्ष की शुरुआत से ही व्यापक जागरूकता अभियान चलाया गया है. उन्होंने भी अपने क्षेत्र में घर-घर जाकर चमकी बुखार के लक्षण एवं इससे बचाव की जानकरी लोगों को दी है.
कोरोना काल में रोज चली 15 किलोमीटर:
कोरोना संक्रमण काल में जब सारे यातायात के साधन बंद हो गये थे। उन दिनों क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं को क्षेत्र भ्रमण में काफी परेशानी हुई थी. रागिनी बताती हैं वह रोज अपने क्षेत्र में सामान्य रुप से 10 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर लोगों को एईएस के बारे में जागरुक करती थी. उनके क्षेत्र से पीएचसी 15 किलोमीटर है जहाँ भी बैठक या प्रशिक्षण में भाग लेने उन्हें पैदल ही जाना पड़ता था। उन्होंने बताया यह दौर लोगों के लिए काफी मुश्किल भरा है. कोरोना संक्रमण के साथ लोगों को अपने बच्चे को एईएस से भी सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है. इस लिहाज से उनकी तरह बाकी स्वास्थ्यकर्मियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है.
रागिनी कहती हैं, ‘‘ यदि मेरी कोशिश से लोग एईएस जैसे गंभीर रोग के प्रति जागरूक होकर अपने बच्चे की जान बचा लेते हैं तो मेरे लिए यह ख़ुशी की बात है. ऐसे भी मेरा कर्तव्य भी लोगों को किसी भी विषम परस्थिति से बचाना ही है’’.

वर्ष 2011 में आशा फैसिलिटेटर के रूप में हुआ चयन:
रागिनी कहती हैं जब उन्होंने 2005 में आशा के रुप में अपनी जिम्मेवारी संभाली थी, तब उनके सामने चुनौतियां बहुत थी। लोगों में स्वास्थ्य को लेकर जानकारी कम थी, सरकारी अस्पताल की सुविधाओं और स्वास्थ्य योजनाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी। वहीं इस क्षेत्र में एईएस का प्रकोप भी अधिक था. पिछड़े और अति-पिछड़े टोलों में लोगों के पास स्वच्छता के फायदे के बारे में नहीं पता था। धीरे-धीरे ही सही लोगों ने स्वच्छता के फायदों को समझा। जो बातें उनके द्वारा बतायी जाती थी, उसे अमल में लाना शुरु किया। उनका चयन वर्ष 2011 में आशा फैसिलेटर के रुप में हुआ। अब उनके उपर करीब 20000 की आबादी के स्वास्थ्य का जिम्मा है। वहीं उनके टीम में 17 आशा कार्यरत हैं.
पिछले वर्ष बचायी है जान:
‘‘वर्ष 2019 में बड़का गांव के एक बच्चे को चमकी का लक्षण आया। कुछ ही देर में मुझे यह बात पता चल गयी। मैं फौरन वहां गयी। देखा तो बच्चे को बहुत से लोगों ने घेर रखा है। सबसे पहले वहां से भीड़ हटाया, फिर साफ कपड़े को चापाकल के पानी में भिगो बच्चे के पूरे शरीर को पोछा। यही क्रम मैंने कुछ देर तक दुहराया। जब बच्चे की हालत स्थिर हो गयी तो मैंने उसे मड़वन पीएचसी में भेज दिया’’ रागिनी ने बताया.



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