चीन के जिस वायरस से भारत लड़ रहा है उसी चीन ने सीमा रेखा पर भारत को ललकारा है. 45 साल बाद भारत-चीन सीमा पर ल’हू बहा है. गोली तो नहीं चली लेकिन ज’ख्म गहरा है। चीन ने पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू फिर इंदिरा गांधी और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत के खिलाफ हिमाकत की है. आखिर चीन क्यों भारत के ताकतवर नेतृत्व के खि’लाफ आक्रामक होता है. चीन की उस रणनीति को अलग अलग कालखंडों के जरिए समझा जा सकता है-
साल 1962
पंडित जवाहरलाल नेहरू ना सिर्फ प्रधानमंत्री थे बल्कि निर्विवाद रूप से देश के सबसे बड़े नेता थे. नेहरू ड्रीमर थे. भारत को लेकर उनके बड़े सपने थे. नेहरू की भारत ही नहीं अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भी धाक थी.
चीन ने 20 अक्टूबर को अचानक भारत पर हमला कर दिया. 21 नवंबर तक चले इस युद्ध में भारत की करारी हार हुई. इस युद्ध ने हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा देने वाले पंडित नेहरू को भीतर से तो’ड़कर रख दिया. पंडित नेहरू उस सदमे से फिर कभी नहीं उबर सके. कहा जाता है कि चीन से मिली पराजय ही पंडित जी की मौ’त की वजह बनी.
साल-1967
पंडित जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं. इंदिरा महत्वाकांक्षी और सख्त व्यक्तित्व की थीं.
चीनी सैनिक ने अचानक सिक्किम के नाथुला और चो ला में भारतीय सैनिकों से झड़प शुरू कर दी. इस झड़प में भारत के 88 सैनिक शहीद हुए जबकि भारत की तरफ से जवाबी कार्रवाई में चीन के 340 सैनिक मारे गए.

साल-1975
इंदिरा गांधी भारत की ताकतवर प्रधानमंत्री थीं. 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को घुटनों पर लाने के बाद इंदिरा गांधी का कद काफी ऊंचा हो चुका था. इंदिरा की छवि एक ऐसे बेहद सख्त नेत्री की थी जो अपनी शर्तों से भारत को एक नई ऊंचाई पर ले जाने का सपना देखती थी.
20 अक्टूबर 1975 को चीन ने अरुणाचल प्रदेश के तुलुंग ला में भारतीय सैनिकों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. इस झड़प में भारत के 4 जवान शहीद हुए. चीन 1962 युद्ध के बाद से ही पूरे अरुणाल प्रदेश को अपना हिस्सा बताता आ रहा है.
साल-2020
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. निर्विवाद रूप से नरेंद्र मोदी देश के इस समय सबसे बड़े नेता हैं. इसलिए नहीं कि वो प्रधानमंत्री हैं बल्कि पिछले चार दशकों के दौरान वो एकमात्र ऐसे नेता बने जिसने अपनी ताकत से लगातार दो बार सरकार बनाई है. मोदी की छवि भी एक ताकतवर नेता की है जिसके भारत को लेकर अपने सपने हैं. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भी मोदी ने अपनी एक धाक बनाई है.
15 और 16 जून की दरमियानी रात चीनी सैनिक लद्दाख के गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर हमला कर देता है. चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच हुई झड़प में हिन्दुस्तान के 20 वीर सैनिक शहीद हो जाते हैं.
अब अगर आप गौर करें तो पायेंगे कि जिन तीन प्रधानमंत्रियों का हमने यहां जिक्र किया है वे भारत के अब तक के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री रहे हैं और इन तीनों के कार्यकाल के दौरान चीन ने अपेक्षाकृत आक्रामक रवैया अपनाया है.
नरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 समाप्त किया. लद्दाख और जम्मू-कश्मीर को यूनियन टेरटरी बनाया. भारत में पाकिस्तान की तरफ से जब आतंकी हमले हुए तो भारतीय सेना ने एक बार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में और दूसरी बार पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देते हुए जता दिया कि ये बदला हुआ भारत है.
दरअसल भारत के ताकतवर प्रधानमंत्रियों के खिलाफ चीन का बेहद आक्रामक रवैया एक रणनीति का हिस्सा है. दुश्मन देश की कोशिश होती है कि वो अपने विरोधी देश के ताकतवर नेतृत्व को कमजोर करे. उस पर हमला करे और उसे उलझा कर रखे ताकि नेतृत्व का मनोबल गिरे और जनता के बीच उसकी छवि खराब हो जाए.
प्रधानमंत्री ने 19 जून को चीन के मामले पर विपक्षी दलों की बैठक बुलाई है. उससे पहले प्रधानमंत्री ने लद्दाख की घटना पर अपनी प्रतिक्रिया में साफ कर दिया है कि भारत अपनी संप्रुभता से समझौता नहीं कर सकता. इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने ये कह कर चीन को जता दिया कि भारतीय सैनिकों ने पीठ नहीं दिखाई और दुश्मनों को मारते-मारते शहीद हुए हैं.
प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ देश के भीतर अपने ही कुछ लोगों ने मोर्चा खोल रखा है. ये वे लोग हैं जो मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बहुत पहले से उनके विरोधी रहे हैं. मोदी के विरोध का उनके विरोधियों को पूरा अधिकार है..लेकिन भारत का विरोध करने का हक किसी को नहीं है. अच्छा रहेगा मोदी विरोधी फिलहाल ‘मजबूत नेतृत्व का मनोबल गिराने की चीनी नीति’ का हिस्सा ना बनें.



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