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भारत क्यों बना रहा अपना स्पेस स्टेशन, जिसमें होंगे कई कमरे, लैब, रिक्रिएशन और कंट्रोल रूम, साइज फुटबॉल मैदान का चौथाई

भारत 2035 तक अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की योजना बना रहा है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) कहा जाएगा. अभी अंतरिक्ष में दो स्पेस स्टेशन काम कर रहे हैं. हालांकि ये बहुत महंगा प्रोजेक्ट होगा. हां, अगर बात भारत की क्षमता की कि जाए तो ये पक्का इसरो इसे बनाकर अंतरिक्ष में भेज सकता है, जो आने वाले सालों में भारत के लिए बहुत काम का साबित होगा.

सवाल – भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) की शुरुआत कब हो जाएगी, कब तक ये पूरी तरह काम करने लगेगा?
– इसका पहला मॉड्यूल 2028 में LVM3 लॉन्च वाहन द्वारा लांच हो जाने की उम्मीद है, यानि हल्के तौर पर भारत का काम चार साल बाद अंतरिक्ष में अपने इस स्टेशन के जरिए शुरू हो जाएगा. लेकिन पूरी तरह से भारत का ये अंतरिक्ष स्टेशन 2035 में पूरा होगा, जब इसके दूसरे मॉडयूल्स सेट कर दिए जाएंगे.

सवाल – ये अंतरिक्ष स्टेशन कैसा होगा. क्या इसमें पर्याप्त जगह होती है?
– भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन कुल मिलाकर 27 मीटर लंबा और 20 मीटर चौड़ा होगा. आप ये कह सकते हैं कि जितना बड़ा एक फुटबाल का मैदान (100.58 मीटर लंबा और 64.01 मीटर चौड़ा) के चौथाई हिस्से के बराबर होका. यानि अगर एक बंगले के तौर पर देखें तो ये बड़ा अंतरिक्ष स्टेशन होगा लेकिन इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन जितना लंबा चौड़ा नहीं, जो 109 मीटर लंबा और 75 मीटर चौड़ा है.

सवाल – इसका वजन कितना होगा?
– इस स्पेस स्टेशन का वजन 52 टन होगा. ये पृथ्वी की निचली कक्षा में 400 किलोमीटर ऊपर स्थापित किया जाएगा. इसकी डिजाइन इस तरह होगी कि इसमें 3 से 4 एस्ट्रोनॉट्स तीन से छह महीने तक आराम से रह सकें. मौजूदा इंटरनेशनल स्पेश स्टेशन भी 400 किमी ऊपर ही पृथ्वी के लो – आर्बिट में घूम रहा है.
इसमें कई तरह की शोध सुविधाओं और रहने वाले कमरों को एकीकृत किया जाएगा. ये ऐसा होगा जिसमें सघन वैज्ञानिक रिसर्च माइक्रोग्रेविटी कंडीशन में हो सकती है. इससे भारत की अंतरिक्ष संबंधी एक्सप्लोर और साइंटिफिक योगदान संबंधी क्षमताएं बढ़ जाएंगी.
लिविंग क्वार्टर्स – 03-04 एस्ट्रोनॉट के रहने की जगह
लैबोरेटरी स्पेस – ये जगह पूरी तरह से साइंटिफिक प्रयोगों के लिए होगी, जिसमें मटीरियल साइंस, बॉयोलॉजी और फिजिक्स संबंधी रिसर्च हो सकेंगी.
कंट्रोल सेंटर – जो स्टेशन की मॉनिटरिंग और आपरेशंस को देखने के साथ एक्सपेरिमेंट्स को चलाने के काम देखेगा.

एक्सरसाइज और रिक्रेशन एरिया – ये जगह फिजिकल फिटनेस और रिलैक्सेशन के लिए होगी, ताकि लंबे मिशन के दौरान एस्ट्रोनॉट्स यहां आकर तरोताजा फील कर सकें.

मेडिकल बे – यहां एक छोटी मेडिकल सुविधा होगी, जिसमें बेसिक हेल्थकेयर जरूरतों की चीजें और उपकरण होंगे.
स्टोरेज एरिया – यहां उपकरण, सप्लाई में आने वाले सामान और साइंटिफिक उपकरण रखे जाएंगे.
लाइफ सपोर्ट सिस्टम – यहां हवा और पानी रिसाइकिलिंग, वेस्ट मैनेजमेंट और एनवायरमेंट कंट्रोल सिस्टम होगा.

सवाल – जब पूरा अंतरिक्ष स्टेशन बन जाएगा, तब भारत इसका क्या इस्तेमाल करेगा?
– रिसर्च संबंधी इस्तेमाल तो होगा ही साथ ही वर्ष 2040 तक ये अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजने के लिए एक महत्वपूर्ण हिस्से का काम करेगा. ये भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमताओं को आगे बढ़ाने और लंबी अवधि के मिशनों को सक्षम करने में मदद करेगा.

सवाल – क्या भारत एक मुकम्मल अंतरिक्ष स्टेशन बनाने में सक्षम है?
– इसरो ने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में अपनी एक्सपर्टीज साबित कर दी है. उसने पिछले कुछ दशकों में इस काम में लगातार प्रगति की है, कई सैटेलाइट्स और अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक लांच किया है. तीन चंद्रयान, मंगलयान और सूर्य यान को सफलतापूर्वक लांच कर चुका भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानि इसरो साबित कर चुका है कि स्पेस संबंधी तकनीक, आपरेशंस और ज्ञान में वह काफी आगे निकलकर दुनिया की बड़़ी स्पेस ताकतों में शामिल हो चुका है.
नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) और फिर से इस्तेमाल किये जाने वाले लांच वाहन भारत की स्पेस लांच क्षमताओं को और बढाएंगे. इसरो के पास अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में व्यापक अनुभव वाले अत्यधिक कुशल वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों की एक टीम है. इसरो के पास वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और सहायक कर्मचारियों सहित 17,000 से अधिक कर्मचारियों की काबिल वर्कफोर्स है.

सवाल – अंतरिक्ष स्टेशन बनाने के लिए क्या भारत दूसरे देशों की मदद लेगा या ये काम खुद करेगा?
– मोटे तौर पर ये पूरी तरह स्वदेशी होगा लेकिन भारत NASA, ESA और JAXA जैसी अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ इस काम में सहयोग लेगा, जो तकनीकी सहायता और विशेषज्ञता के रूप में होगा.

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