अपना धर्म भले बदल लीजिए लेकिन सेव को सेव और आम को आम ही रहने दीजिए
नज़रिया
देवेन्द्र प्रसाद सिंह
आदमी के बारे में नहीं बता सकता लेकिन परिंदों में फिरकापरस्ती नहीं होती, कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे…..कभी गंगा जल मिला तो वो भी पी लिया तो कभी आब-ए-जमजम मिला तो वो भी पी लिया. क्योंकि वे पंछी हैं, इतनी समझदारी कहां कि कौन दाढ़ी वाला है और कौन टोपी वाला. अनाज के दाने जिसके घर के आगे मिले, चुग लिया, पूछा नहीं कि दाढ़ी वाले के हैं या टोपी वालों के. क्योंकि इनका कोई धरम नहीं होता. सिर्फ बुलंदी होती है, जिंदादिली होती है और अपनी चहचहाहट से बागों और बस्तियों को जीवंत बनाए रखने की क्षमता होती है. फिरकापरस्ती वहां होती है जहां विधाता की सबसे सुंदर और विवेकशील रचना प्राणी मानव रहता है. जंगलों में रहने वाला मानव तो इतना विवेकशील नहीं था लेकिन सभ्यता की लंबी छलांग ने अब उसे फलों के भी हिन्दू-मुसलमान होने का फर्क महसूस करा दिया है. प्रकृति ने तो एक ही बाग में कई तरह के फल और फूल उगाए । जबतक वे बागों और बगीचों में रहते हैं, उनकी न कोई जाति होती है और न कोई धर्म. लेकिन जैसे ये मनुष्यों के टोकरे में पहुंचते हैं, इनके भी धर्म बदल जाते हैं. अगल-अलग धार्मिक निशानों से इनके धर्म की पहचान होने लगती है.
खासकर जबसे कोरोना वायरस आया है, इस पहचान को वजूद मिला है. पहले यह झारखंड के जमशेदपुर में देखने को मिला, फिर रांची में. अब पूरे झारखंड होते बिहार तक पहुंच गया है. कदमा में इन फलों की पहचान कराई ‘विश्व ङ्क्षहदू परिषद् द्वारा अनुमोदित फल दुकान’ के बैनरों ने. ऐसी खबरें रांची से भी आई हैं, जहां फल और सब्जी बेचने वाले दुकानदार या ठेले वाले भगवान महावीर का झंडा लगा रहे हैं. ऐसे दुकानदार कहते हैं कि पिछले कुछ दिनों से बिक्री में गिरावट आ गई थी क्योंकि सोशल मीडिया पर एक वीडियो नमूदार हुआ था जिसमें एक खास समाज द्वारा फलों के साथ कुछ ऐसा-वैसा करता दिखाया गया था.
इसके बाद दूसरे समुदाय के लोगों ने सामान खरीदना कम कर दिया. एक तो लॉकडाउन में ऐसे ही लोग घर से बाहर नहीं आ रहे. ऊपर से सोशल मीडिया का जहर बोना. अपने बिजनेस को चलाने के लिए ऐसा करना पड़ा. हालांकि उन्होंने खुद ऐसा नहीं किया बल्कि एक हिन्दूवादी संगठन के लोगों के सुझाव पर ऐसा किया गया. अब तो इस मामले पर सियासी रंग चढ़ चुका है. कोरोना के खिलाफ एकजुटता तो पीछे छूट गई, अब फलों के ठेलों पर लगे झंडों के हिसाब से पक्ष और विरोध में मोर्चाबंदी होने लगी है. बड़े-बड़े नेता इस सियासत में कूद पड़े हैं. लगता है, अब तो उन राहत वाले भोजन के पैकेटों के भी धर्म तय होने लगेंगे और निशानों को देखकर लोग उन्हें स्वीकार और इंकार किया करेंगे. जमशेदपुर के कदमा वाले प्रकरण में पुलिस ने कार्रवाई की बात भी कही थी लेकिन दिग्गज राजनेताओं के मैदान में कूदने के बाद वह भी बैकफुट पर आई दिख रही है. अब पुलिस की ओर से कहा जा रहा है कि वह कार्रवाई नहीं फकत एक नोटिस था. गांव में एक कहावत है-बच्चा के जम्हुआ (एक प्रकार का रोग) से मरले न डेराई, ओकरा परिकले डेराई. यह सिर्फ अब फल के ठेले तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि कटुता जीवन के विविध आयामों को भी स्पर्श करेगी.
सोशल मीडिया ने इस मामले को देश विदेश तक फैला दिया है. झारखंड का ‘जहर बिहार भी पहुंच चुका है. नालंदा जि़ले के बिहार शरीफ़ में भी ऐसा ही मामला सामने आने के बाद वहां की पुलिस ने भी आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत केस किया है. केस दर्ज किए जाने के बाद आरोपियों की गिरफ़्तारी के लिए कार्रवाई की जा रही है. दुकानों की शिनाख्त के लिए उन्हें भगवा झंडे बांटने को लेकर पुलिस ने बजरंग दल के दो सदस्य व 5 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. दिल थाम कर बैठिए, वहां भी किक देने वाले मामलों का फिलहाल अकाल है.
कोई मुद्दा किक नहीं ले रहा. उम्मीद रखिए कि बिहार होते जल्द ही यह यूपी भी पहुंचेगा और फिर पूरे देश में. वैसे, हमारा मानना है कि अभी हम जिस दुश्मन (कोरोना वायरस) से लड़ रहे हैं, एकजुट होकर पहले इससे निपट लेते. फिर दूसरा मोर्चा खोलते तो जंग आसान रहती. चार मोर्चे एक साथ खोलना युद्ध नीति के भी खिलाफ है. दूसरी बात यह कि चाहे इस तरफ के हों या उस तरफ के. कम से कम प्रकृति की बनाई चीजों पर सियासत का रंग मत चढ़ाइए. अपना धर्म भले बदल लीजिए लेकिन सेव को सेव और आम को आम ही रहने दीजिए……




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