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शनिवार के दिन क्यों की जाती है शनि देव की पूजा, जानें शनि महाराज के जन्म की पौराणिक कथा

हिंदू धर्म में हर दिन किसी न किसी देवी- देवता को समर्पित है. शनिवार का दिन शनि महाराज और काल भैरव को समर्पित होता है. इस दिन शनिदेव प्रसन्न को प्रसन्न करने के लिए पूजा की जाती है. शनि महाराज को निर्णायक ग्रह कहा जाता है. शनि देव की प्रकृति काफी उग्र मानी जाती हैं जो कि अपना तत्काल प्रभाव दिखाते हैं. शनिदेव का नाम आते ही लोगों में भय पैदा हो जाता है. कहते हैं जिन लोगों के ऊपर शनिदेव की टेढ़ी नजर होती है, उनके ऊपर तमाम तरह की विपत्तियां आती हैं, बीमारियां आने लगती हैं और मानसिक पीड़ा का दौर आरंभ हो जाता है. शनिदेव को न्याय का देवता माना गया है.

शनिवार के दिन शनिदेव की पूरे अनुष्ठान से पूजा की जाती है और साथ ही इस दिन व्रत भी किया जाता है. शनिवार के दिन सभी भक्त शनि मंदिर में जाकर शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाते हैं. शनिदेव को तेल चढ़ाने की मान्यता काफी प्राचीन है, जिसके पीछे बहुत सी पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं.

शनिवार के दिन शनि पूजा का महत्व

शनिदेव के गुरु स्वयं महादेव हैं और उनसे ही शनिदेव को यह वरदान प्राप्त है कि वे हर किसी व्यक्ति को उनके कर्मों के अनुसार फल दें. कोई भी मनुष्य शनि के प्रकोप से कर्मों के अनुसार नहीं बच पाया है. अगर आपकी कुंडली में शनि कमजोर स्थिति में है, आप महादशा में हों या फिर जीवन में और बहुत तरह की परेशानियां हों, तो इन सभी मुश्किलों से छुटकारा पाने के लिए शनिवार के दिन शनि देव की पूजा की जाती है.

कहते हैं शनिवार का व्रत करने से आपके जीवन में यश, सुख, समृद्धि, शांति और सौभाग्य की वृद्धि होती है. जीवन के सभी प्रकार के कष्ट शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा करने से दूर हो जाते हैं.

कैसे हुआ शनिदेव का जन्म?

शनिदेव की उत्पत्ति को लेकर बहुत सी पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. एक पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य का विवाह प्रजापति दक्ष की कन्या संज्ञा से हुआ था. संज्ञा से यम, यमुना और मनु पैदा हुए. सूर्य देव का तेज उनकी पत्नी संज्ञा ज्यादा दिन तक सह नहीं पाईं. ऐसे में संज्ञा अपनी छाया को सूर्य देव की सेवा में छोड़कर चली गईं. कुछ दिनों बाद छाया से शनिदेव का जन्म हुआ.

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