झारखंड गठन के बाद से अब तक ट्रेजरी से निकाले गए करीब 6200 करोड़ रुपए का कोई अता-पता नहीं है। बार-बार निर्देश के बावजूद अधिकारियों द्वारा सरकारी कामकाज के लिए निकाले गए अग्रिम राशि (एसी बिल) का हिसाब नहीं देने को सरकार ने अब गंभीरता से लिया है।

बकाया अग्रिम का हिसाब नहीं देने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के एनुअल परफार्मेंस एप्रेजल रिपोर्ट (एपीएआर) में अब यह मामला दर्ज होगा। सदस्य राजस्व पर्षद एपी सिंह की अध्यक्षता में बनी उच्चस्तरीय समिति की तीन दौर में हुई बैठक के बाद यह फैसला लिया गया है।
उच्चस्तरीय समिति की बैठकों में यह माना गया कि एसी बिल के माध्यम से निकाले गए अग्रिम राशि का हिसाब (डीसी बिल) देने की गति नगण्य जैसा है। इस मामले में विभागों को गंभीर होने की जरूरत है। वित्त विभाग में 16 अगस्त से 18 अगस्त तक हुई बैठकों में विभागीय सचिवों से कहा गया कि लंबित डीसी बिल की राशि का 15 दिन में समायोजन कराएं। ऐसा न होने पर संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी तय करें। बकाया अग्रिम की राशि ब्याज के साथ राजकोष में जमा करवाएं।
किस साल कितनी राशि का नहीं मिला हिसाब

अग्रिम बकाए का हिसाब नहीं देने वाले अफसरों के एपीएआर में दर्ज करें मामला
वित्त विभाग के विशेष कार्य पदाधिकारी अविनाश कुमार सिंह ने राज्य के सभी विभागीय अपर मुख्य सचिव, प्रधान सचिव और सचिवों को इस संबंध में पत्र भेजा है। कहा गया है कि वे ऐसे अधिकारियों के एपीएआर में वित्तीय अनुशासन की बातों को शामिल करें।
लिखें कि अग्रिम लेने वाले अधिकारियों ने लंबित डीसी बिल का समय पर समायोजन किया है या नहीं। ऑडिट पारा कंप्लायंस स्टेटस के मामले को भी उसमें अंकित करें। इससे अधिकारियों और कर्मचारियों में सरकारी राशि के वित्तीय प्रबंधन और अनुशासन को बढ़ावा मिलेगा।
महालेखाकार की आपत्ति के बाद सरकार ने उठाया कदम
प्रधान महालेखाकार आरके अग्रवाल ने अगस्त में वित्त सचिव को पत्र लिखा था। कहा था कि अनुदान का पैसा एसी बिल के माध्यम से भी निकाल लिया जाता है, जो अनुचित है। इससे पहले महालेखाकार ने कई बार मुख्य सचिव को लंबित डीसी बिल के लिए पत्र भेजा था। इसमें कहा था कि नियम विरुद्ध तरीके से एसी बिल निकालने का सिलसिला जारी है।




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