मोतियाबिंद की सर्जरी के बाद कई मरीजों के आंखों की रोशनी कम होने या ब्लाइंडनेस की समस्या काफी देखी जाती है। आंख के पर्दा के पास की रेटिना पर स्थित मैकुला में सूजन हो जाता है। इसे मेडिकल साइंस में सिस्टायड मैकुलर ओडेमा कहा जाता है। यह इतनी खतरनाक बीमारी है कि इसका पता हमेशा लास्ट स्टेज में ही चलता है, जब आंखों की रोशनी काफी हम हद तक चली जाती है।
इस रोग को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सका है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयुर्वेद का एक खास नुस्खा तैयार किया गया है, जिससे 90% तक फायदा मिल रहा है। हालांकि, अभी इस दवा कंपोजिशन का साल 2018 में पेटेंट फाइल किया गया है, जो अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है।

प्रो. बी मुखोपाध्याय।
आयुर्वेद फैकल्टी स्थित शालाक्य तंत्र के विभागाध्यक्ष प्रो. बी मुखोपाध्याय ने 6 साल तक यह स्टडी की है। साल 2016 से अब तक उनकी OPD में आए 100 रोगियों पर इस नुस्खे को आजमाया गया, तो उसका पॉजिटिव असर दिखा है। प्रोफेसर का कहना है कि कई मरीजों की 90% बीमारी खत्म हो गई। जबकि माॅडर्न मेडिसीन में इसका टेंपरोरी ट्रीटमेंट हैं।

गुग्गुल पौधे के बीज से बनाया गया नुस्खा। इसका पाउडर आयुर्वेदिक मेडिकल स्टोर पर भी मिलते हैं।
प्रो. मुखोपाध्याय ने कहा कि मैकुला आंख के अंदरूनी हिस्से रेटिना का वह भाग है जिस पर कोई इमेज बनती है। आंख से देखा गया चित्र नर्वस सिस्टम द्वारा दिमाग तक पहुंचता है। इससे हम भी किसी चीज को देख पाते हैं। कई बार डायबिटीज, ब्लड प्रेशर या किसी सर्जरी की वजह से भी मैकुला में सूजन की समस्या आ जाती है। इससे आंखों में चित्र बनना बंद हो जाता है। इस रोग में बीमार इंसान की आंख बिल्कुल सही दिखती है, मगर दिखाई कुछ भी नहीं देता। इसमें चश्मा भी काम नहीं करता।






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