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मुजफ्फरपुर : नालों से अतिक्रमण हटाने की जरूरत, 1000 के बदले सिर्फ 187 क्यूसेक लीटर ही निकल पाता है पानी

शहरी क्षेत्र में आम दिनाें में घराें के पानी निकास के लिए नाले बने हैं। बरसात के दिनाें के लिए स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम भी बना है। लेकिन, वास्तविकता यह भी है कि ये पुराने बने नाले और ड्रेन अतिक्रमण की भेंट चढ़ रहे हैं। नतीजा यह है कि हर साल बारिश के दिनाें में शहर में भारी जलजमाव हाेता है। अधिकतर मोहल्लों में चार-पांच महीने नाले का गंदा पानी ओवरफ्लाे हाेकर बजबजाता रहता है। दैनिक भास्कर ने एक्सपर्ट इंजीनियरों की टीम के साथ नालाें की हकीकत जाना। टीम ने पाया अतिक्रमण के कारण अधिकतर जगहों पर नाले दम ताेड़ रहे हैं। कई जगहों पर 5 फीट का पक्का नाला एक-डेढ़ फीट तक सिकुड़ चुका है।

जैसे- गोबरसही रेलवे गुमटी के पास 5 फीट का नाला मझाैलिया गुमटी से आगे बढ़ने पर अतिक्रमणकारियों के कब्जे के कारण शिव मंदिर पहुंचते-पहुंचते डेढ़ फीट बच जाता है। यह नाला मेन ड्रेनेज से जुड़ता है। ऐसी स्थिति हाेने पर जिस नाले से एक हजार क्यूसेक पानी का बहाव हाेना चाहिए, उससे महज 187.50 क्यूसेक ही डिस्चार्ज हाे पाता है।

यानी, इसका सीधा मतलब है कि प्रति सेकेंड शहर में 812 घन लीटर प्रति सेकेंड पानी जमा हाेने लगता है। ऊपर से बारिश और घराें से निकल रहा पानी भी दबाव बढ़ाता है। यदि निगम तत्काल ट्रैफिक समस्या समाधान की तरह नालाें से अतिक्रमण हटाए, ताे जलजमाव के स्थायी समाधान की राह खुलेगी। शहर में जलजमाव के समाधान की तीसरी कड़ी में आज पढ़िए कहां-कहां है अतिक्रमण और इसे ताेड़ना क्याें जरूरी है।

मोतीझील से दामुचक इलाके तक मेन ड्रेनेज पर कई जगह अतिक्रमण
ज्ञात हाे कि सेना स्टेशन हेडक्वार्टर, चक्कर मैदान आदि इलाके में जलजमाव के बाद मझाैलिया गुमटी इलाके में निगम ने कुछ अतिक्रमण हटाया। लेकिन, फिर अभियान ठप पड़ गया। शहर के सबसे प्रमुख ड्रेनेज मोतीझील से मझाैलिया के रास्ते खबड़ा चाैर में मिलता है। लेकिन, मोतीझील से दामुचक तक कई जगह मेन ड्रेन पर अतिक्रमण है।

अतिक्रमण की वजह से सरकारी निर्माण एजेंसी बुडकाे मोतीझील मेन ड्रेनेज का काम शुरू नहीं कर सकी है। एक्सपर्ट्स ने पाया कि बुडकाे ने ड्रेन के लिए लेवल और पानी बहाव के लिए शहर का बेंचमार्क लिया है। लेकिन, उसने भी कहीं इसे लिखा नहीं है। तकनीकी समस्या यहीं से शुरू हाेती है।

कायदे से शहर में छाेटे नाले बनें या बड़े, निर्माण एजेंसी काे इसका बेंचमार्क लिखना चाहिए। ताकि, उसके आसपास जब कभी और काेई दूसरी एजेंसी भी काम करे ताे पानी के बहाव का लेवल पता रहे। इससे बहाव में बाधा नहीं हाेगी।

सर्किट हाउस : नाले पर लगाई लोहे की जाली
माड़ीपुर पावर हाउस चौक, सेना के स्टेशन हेडक्वार्टर और गोबरसही गुमटी तक नाले में गाद भरी है। इसकी सफाई नहीं हाे पाती है। इसकी वजह सर्किट हाउस की दीवार के साथ लाेहे की जाली से घेराबंदी है। घेराबंदी खुद प्रशासन ने कराई है। यहां नाले का पानी ओवरफ्लाे हाेता है। पूरे इलाके में जलजमाव रहता है।

जानिए क्यों जरूरी है वाटर बेंचमार्क पोस्ट
हर शहर या गांव की अपनी बसावट होती है। उस बसावट के अनुसार पानी का बहाव निर्धारित होता है। किसी भी निर्माण के लिए डिजाइन बनाते वक्त इंजीनियर सबसे पहले पानी का बहाव ही देखते हैं। इसका लेवल लेते हैं। उस बहाव के मुताबिक ही छोटे-बड़े नाले अथवा स्टॉर्म वाटर सीवरेज एंड ड्रेनेज यानी एसटीपी का काम होता है। हर निर्माण के साथ चौक-चौराहों या जंक्शन पर इसे दर्शाना होता है, ताकि अन्य निर्माण एजेंसियां भी इसी के अनुसार काम करें।

ऐसे समझिए क्या है पानी बहाव का गणित
5 फीट के किसी पक्के नाले का आयतन 5X5X5 घनफीट (125 क्यूबिक फीट) हाेता है। ऐसे नाले से पानी का सामान्य बहाव 8 फीट प्रति सेकेंड या 8 गुना घन लीटर प्रति सेकेंड (क्यूसेक लीटर) हाेता है। इसका मतलब हुआ 125X8 यानी 1000 क्यूसेक लीटर बहाव। लेकिन, इसी नाले पर आधा अतिक्रमण हाे और 20 प्रतिशत गाद जमी हाे ताे बहाव घट कर 3 फीट प्रति सेकेंड वेलोसिटी पर आ जाता है। ऐसे नाले से 375 क्यूसेक पानी का बहाव हाे सकता है। लेकिन, अतिक्रमण के कारण नाला डेढ़ फीट बचा है। इसका मतलब है पानी का बहाव और घट कर 187.50 क्यूसेक लीटर तक रह गया है।

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